जीवन में कुछ ऐसे क्षण होते हैं , जब शब्द भावनाओं को व्यक्त करने में असमर्थ हो जाते हैं। एक अजीब-सी बेबसी, लाचारी और दर्द का एहसास होता है, लेकिन कुछ कर नहीं सकते। 19 सितंबर और उसके बाद के दिन मेरे लिए ऐसे ही थे। उस दिन हमारे प्रिय जुबीन के हादसे की खबर जैसे आसमान से बिजली गिरने जैसी थी। असम के हमारे निवासी और उनके करोड़ों प्रशंसकों की तरह मैं भी स्तब्ध रह गया। समझ नहीं पाया कि कैसे प्रतिक्रिया दूं, क्या सोचूं। मुझे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ।
मैं आमतौर पर शांत और संयमित स्वभाव का हूं, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। लेकिन यह एक ऐसा क्षण था, जब मैं खुद को संभाल नहीं पाया। हर असमिया की तरह, मैं भी उनका बड़ा प्रशंसक रहा हूं। जुबीन के संगीत की दुनिया में प्रवेश का समय मेरे विश्वविद्यालय जीवन के साथ लगभग मेल खाता था। जब 1990 के दशक की शुरुआत में जुबीन अपनी पहचान बना रहे थे, तब मैं गुवाहाटी विश्वविद्यालय से निकल चुका था – वही विश्वविद्यालय जिसे मैं अपना अल्मा मेटर मानता हूं।
उसके बाद जो हुआ, वो तो इतिहास है -उनका तेजी से चमकता हुआ सितारा की तरह उभरना, उनकी आत्मा को छू लेने वाली आवाज, जो असम के हर घर-आंगन में गूंजने लगी और सीमाओं के पार भी पहुंची। जब मैं यह लिख रहा हूं, तो मेरे अंदर एक गहरी पीड़ा, एक असहनीय शून्यता समा गई है -जैसे किसी अपने, परिवार के एक सदस्य को खो देने का दर्द होता है।
जब सरकार में हमें इस वास्तविकता का सामना करना पड़ा, तो हम तय कर चुके थे कि राज्य के लोगों की ओर से उन्हें वह विदाई देंगे जिसके वे हकदार थे। लेकिन हम में से कोई भी यह पूर्वानुमान नहीं लगा सकता था कि उनकी याद में पूरे राज्य में, उम्र, लिंग और समुदाय की सीमाएं पार करते हुए, इतना गहरा और व्यापक स्नेह दिखाई देगा। वे वास्तव में एक जनप्रिय कलाकार थे, जिनका लोगों के दिलों में एक खास स्थान था, एक मानवीय व्यक्तित्व जिनके दिल में जानवरों, प्रकृति और अपने साथी मानवों के लिए अपार प्रेम था। मैं कह सकता हूं कि असम अपने एक ऐसे गौरवशाली बेटे को पाकर सम्मानित है। अब जब उनकी अंतिम यात्रा और इससे जुड़ी सभी सांसारिक कर्तव्य पूरे किए जा चुके हैं, तो यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम उनकी विरासत को संजोएं। मैं पुनः यह दोहराना चाहता हूं कि हमारी सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि उनके गीत और उनकी अद्भुत शख्सियत हमारे बीच जीवंत रहे।
आने वाले हफ्तों में, हम इस दिशा में कार्य करेंगे कि हम किस तरह उनके प्रति एक स्थायी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं, जिन्होंने हमारे दिलों पर राज किया। लेकिन जो हम खो चुके हैं, उसे पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। कई कलाकार आए और गए, लेकिन जुबीन का जो हमारे दिलों में स्थान है, वह कोई दूसरा नहीं ले सकता।
भूपेन दा के जन्मशती समारोह के शुभारंभ के लिए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की असम यात्रा इस बात का एक और उदाहरण है कि कैसे असम और पूर्वोत्तर ने हमारे प्रिय प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के हृदय में एक अभूतपूर्व स्थान हासिल किया है। प्रधानमंत्री जी ने अपनी उपस्थिति से असमिया संस्कृति के महानतम प्रतीकों में से एक को श्रद्धांजलि अर्पित करने के हमारे प्रयास को एक शानदार शुरुआत दी।
यह उनकी सहृदयता ही थी कि विशाल बिहू प्रदर्शन के साथ-साथ झुमुर समारोह के लिए भी वह असम में उपस्थित रहे, जब पूरा असम एकजुट होकर दुनिया के सामने एक भव्य समारोह का आयोजन कर रहा था। मोदी जी का असमिया संस्कृति और उसके प्रतीक के प्रति अपार प्रेम अब सर्वविदित हो गया है। मेरी सीमित समझ के अनुसार, कोई भी अन्य राज्य हमारे प्रिय प्रधानमंत्री को उस तरह आकर्षित नहीं कर पाया है, जिस तरह असम ने किया है। इसी प्रेम ने हमें कठिन समय से शांति और समृद्धि की ओर अग्रसर किया है। कोई उनका ऋणी कैसे न हो?
मोदी जी ने जन विकास और हजारों करोड़ रुपये की औद्योगिक परियोजनाओं को भी समर्पित किया, जिससे इस क्षेत्र के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता एक बार फिर रेखांकित हुई। हाल के दिनों में, मुझे एक भी दिन ऐसा याद नहीं आता जब केंद्र असम और उसकी सात बहनों के लिए किसी न किसी परियोजना की घोषणा न कर रहा हो। हाल ही में संसद में आईआईएम विधेयक के पारित होने से गुवाहाटी में एक भारतीय प्रबंधन संस्थान की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यह पूर्वोत्तर में दूसरा और भारत में 22वां संस्थान होगा। इसने गुवाहाटी को पूर्वोत्तर का शैक्षिक केंद्र बनने का मार्ग प्रशस्त किया है। एक आईआईटी, एक आईआईएम, एक एम्स , एक राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, एक फोरेंसिक विज्ञान संस्थान, एक आईआईआईटी , इस शहर ने लगभग सभी क्षेत्रों को कवर किया है। अब देश भर के छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए गुवाहाटी को अपने बच्चों की उच्च शिक्षा के विकल्पों में से एक मानने के कई कारण हैं। केंद्र सरकार के साथ मेरा अनुभव बहुत यादगार रहा है। मैंने असम के लोगों के लिए, चाहे किसी भी परिस्थिति में, जो भी चाहा है, केंद्र सरकार ने हमेशा उसे साकार करने का प्रयास किया है। यही वह सकारात्मकता है जो पिछले 60 वर्षों से भी अधिक समय से, जब भी पूर्वोत्तर या असम की चर्चा हुई है, गायब थी। हालांकि, प्रधानमंत्री की असम और पूर्वोत्तर के लिए एक अलग सोच है, जिसका प्रभाव उनके पूरे मंत्रिमंडल पर पड़ा है। बुनियादी ढांचे से लेकर आवास तक, उद्योग से लेकर जहाजरानी तक, केंद्र के आशीर्वाद से हमारे राज्य में ढेरों परियोजनाएं आई हैं। मुझे विश्वास है कि यह संबंध आगे भी प्रगाढ़ होते रहेंगे।






