दुष्यंत
मैं मुंबई में बैठा जुबिन गर्ग को मिल रही अभूतपूर्व विदाई देख रहा हूं, न केवल इसलिए कि मेरा भी संगीत और गीतों की दुनिया से जुड़ाव है, जो मेरा पेशा और जुनून दोनों है, बल्कि इसलिए भी कि मुझे लगता है जुबिन असम के पहले ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने भूपेन हजारिका के बाद इस स्तर की लोकप्रियता हासिल की है। इस तरह की लोकप्रियता पाना अपने आप में एक दुर्लभ घटना है। यह सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का विषय होना चाहिए। दिसपुर की वर्तमान सरकार ने भी जनता की भावना और समय के अनुरूप रहकर अपनी भूमिका निभाई है। असम के इस महान सपूत को जिस प्रेम और सम्मान से नवाजा गया है, वह आधुनिक भारतीय इतिहास में अभूतपूर्व है।
मैं मूल रूप से राजस्थान से हूं, और मुझे याद नहीं कि कभी किसी कलाकार- या किसी भी व्यक्ति- को ऐसी विदाई मिली हो। यह सचमुच ” larger than life” अनुभव है। किसी भी व्यक्ति के लिए यह जीवन में या मृत्यु के बाद मिलने वाला ऐसा सम्मान होना चाहिए, जिसकी आकांक्षा करना सार्थक हो- जैसा कि जुबिन दा को मिला है।
मुझे एक घटना याद आती है, जब मैं मुंबई में अपने शुरुआती दिनों में था। मुझे एक संगीतकार से मिलने जाना था, जो नेटवर्किंग का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि उनका रिकॉर्डिंग सेशन है और उसके बाद हम मिल सकते हैं। मैं अंधेरी वेस्ट की वीरा देसाई रोड स्थित उनके स्टूडियो पहुंचा और रिकॉर्डिंग खत्म होने तक लाउंज में बैठा रहा। रिकॉर्डिंग खत्म हुई, और कुछ लोग तेजी से स्टूडियो से बाहर निकल गए, मानो हवा की तरह गुजर गए हों। संगीतकार ने मुझे कैफे में बुलाया, और हमने औपचारिक बातें कीं। मैंने उनसे रिकॉर्डिंग और गायक के बारे में पूछा। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “वह एक खास गीत था, जुबिन गर्ग ने गाया था। वो अभी-अभी गए, क्या तुमने उन्हें नहीं देखा?”
मैं उस ऊर्जा और आभा को आज भी महसूस करता हूं, जो मेरे सामने हवा की गति से गुजर गई थी। यह मेरे जीवन की शायद एकमात्र घटना रहेगी जब मैं जुबिन दा के एकदम निकट था। बाद में जुबिन दा के साथ, मेरे गीतों को लेकर, एक गाना रिकॉर्ड कराने का प्रस्ताव भी आया था। दुर्भाग्यवश वह प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला गया, और जीवित किंवदंती के साथ काम करने का अवसर एक सपना ही रह गया। इतिहास रचने जैसा एक मौका हाथ से फिसल गया।
कुछ समय बाद मैंनें सुना कि जुबिन गर्ग ने रीमा बोरा द्वारा निर्देशित एक नॉन-फिक्शन फिल्म के लिए, संगीतकार के रूप में, अपना पहला (और शायद एकमात्र) राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त किया है। यह जानकर मुझे उनसे एक अलग स्तर की नजदीकी महसूस हुई।
मुंबई के संगीतकारों के बीच, जब भी जुबिन गर्ग का नाम आया, मैंने उनके भीतर एक अलग ही प्रेम और सम्मान देखा है। अपने सीमित करियर में मैंने यहां किसी भी व्यक्ति के लिए, न केवल सार्वजनिक रूप से बल्कि पर्दे के पीछे भी, इतना सम्मान और प्रेम शायद ही कभी देखा है।
मुझे हमेशा जुबिन दा पसंद रहे – क्योंकि वे रीढ़ वाले व्यक्ति थे। उनकी संवेदनशील राजनीतिक समझ ने उन्हें उनके समकालीन नामचीन कलाकारों से अलग और ऊपर खड़ा कर दिया था। शायद इसी कारण उनका जनता के साथ जुड़ाव ज्यादा गहरा और टिकाऊ हुआ। इतना गहरा कि जिस पर कलाकार ईर्ष्या कर सकते हैं- पर ऐसा जुड़ाव तभी संभव है जब राजनीतिक साहस सच्चा हो। इसलिए इस संदर्भ में, असम की सरकार भी प्रशंसा की पात्र है कि उसने उनकी राजनीतिक राय के लिए उन्हें नकारा नहीं, बल्कि उनके मानवीय पक्ष के साथ उन्हें अपनाया।
असल में, जुबिन सचमुच “जनता के कलाकार” बन चुके थे। और उन्होंने इस भूमिका को गरिमा और जिम्मेदारी के साथ निभाया। सामान्यतः हम देखते आए हैं कि कई लोग जनता के प्रेम और ऊंचाई से नीचे गिर जाते हैं। लेकिन जुबिन सिर्फ अपनी भाषा, संस्कृति और क्षेत्र की अनिवार्य आवाज ही नहीं थे, बल्कि मेरे जैसे दूर बैठे हमसफरों के लिए प्रेरणा और गर्व का स्रोत भी थे।
एक कवि-गीतकार के बेटे का संगीत में ऐसे मुकाम तक पहुंचना – यह हमेशा अगली पीढ़ी के लिए सकारात्मक और स्वागतयोग्य होता है, जैसा कि हम विशाल भारद्वाज (श्रीराम शर्मा के पुत्र) के उदाहरण में भी देखते हैं। असम के दिलों की धड़कन सिर्फ एक कवि के योग्य पुत्र ही नहीं थे, बल्कि अपने वतन के भी सबसे योग्य पुत्र साबित हुए। कलाकार के रूप में भी और इंसान के रूप में भी – उन्होंने अपने परिवार और अपनी मिट्टी दोनों का नाम रोशन किया।
हर धरती को ऐसा बेटा मिले! मन से महसूस होता है कि मेघालय की पहाड़ियां, जहां जुबिन दा ने जन्म लिया, सदियों तक उन्हें पुकारती रहेंगी – और ब्रह्मपुत्र की लहरें उन्हें आशीर्वाद देती रहेंगी, कि वे फिर से असम की इस मिट्टी पर जन्म लें!
(लेखक एक पूर्व शिक्षाविद्, उपन्यासकार, अखबार स्तंभकार और गीतकार हैं)










